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Tips Of the Day

आयुर्वेद प्रकृति की एक कला है अतह आयुर्वेद के नियमो का पालन करें| जैसे:
 
.समय पर खाना खाये
 
.अपने भोजन पर ध्यान दें 
 
.अपनी प्रकृति के अनुसार ही खाये
 
.पानी का उचित मात्रा मे सेवन करें
 
.एक दिन में एक फल खाये
 
.प्रतिदिन 10 मिनिट योगा करें
 

 

रवि आयुर्वेदा मे आपका स्वागत है

 ।। ऊँ तत्-सत् ।। 

     काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, 10 इन्द्रियां, मन बुद्धि ये सव जीव के बन्धन है। मन रूपी  दूत  शरीर को उसके कर्म रूपी भोग को भुगवाता हुआ जीवन व मृत्यु क़ो  प्रकट करता रहता है। जब यह मन भोगो से मुक्त हो जाता है तो मोक्ष को प्रकट कर देता है।


    यह मृत्यु मण्डल नारायण की सब से सुन्दर माया है, इस माया को भोगने के चक्कर में जीव सुख व दुःख के चक्र में फँस कर नाना प्रकार की यानियों को भोगता है जब भोगते-भोगते सत्य को  समझ जाता है तो माया से रहित हो कर फिर नारायण मे लीन हो जाता है।

।। ऊँ तत्-सत् ।।
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 आयुर्वेद सन्छिप्त में :


        इस विज्ञान के युग मे मनुष्य की चिकित्सा के अनेक साधन हो गये हैं जिस में एलोपैथी, युनानी, सिद्धा, होमियोपैथी, नेचुरोपैथी और आयुर्वेद प्रमुख है। इन सभी चिकित्साओं में आयुर्वेद लाखों सालो से रुगण (बिमार) व्यक्तियों की सेवा करता आ रहा है आयुर्वेद सिर्फ  ब़ीमार व्यक्ति की ही चिकित्सा नही करता अपितु धर्म, अर्थ, काम (कामनायें) मोक्ष की चाह रखने वाले प्राणीयों को भी स्वस्थ रखकर इन चार पुरूषार्थे की प्राप्ति कराता है क्योकि अयुर्वेद के अनुसार प्राणी  शरीर से, इन्द्रियों से, मन से, बुद्धि से व आत्मा से अगर स्वस्थ है तो वो प्राणी ही पूर्ण रूप से स्वस्थ माना जाता है नही तो आयुर्वेद के अनुसार प्राणी पूर्ण रूप से स्वस्थ नही माना जाता  है।

समदोष समाग्निष्च समधातु मलक्रियः प्रसन्ना ।
               त्येन्द्रियमनाः स्वस्थ् इत्य मिघियते।।          (महर्शि सु्श्रुत)


        अर्थात:- जिस मनुष्य के बात, पित्त, कफ, समावस्था में हो, जिसमे अग्निया समभाव में परिपाकादि गुणों से युक्त हो, शरीर के रक्त, रस, माँस, भेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र धातुओं की क्रियाएँ समावस्था  में हो तथा शरीर के मल-मुत्र, पुरीष, स्वेदादि अपने सामान्य रूप से विसर्जित होते हो व व्यक्ति की इन्द्रियां, मन एवं आत्मा प्रसन्न हो बह बहुत स्वस्थ पुरूष होता है।
 

 

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