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आयुर्वेद की उत्पत्ति

            आयुर्वेद की रचना श्री ब्रह्मा जी द्वारा की गई है फिर उन्होने अपने बेटे दक्ष प्रजापति को  इसका ज्ञान कराया कि किस तरह से हम अपनी सम्पूर्ण आयु को बचा सकते है दक्ष प्रजापति ने अश्विनी कुमार को बताया व अश्विनी कुमार ने इन्द्रदेव को, देवराज इन्द्र ने भरद्वाज आदि को आयुर्वेद का ज्ञान दिया | इस प्रकार इस आयुर्वेद को एक से दुसरे ऋषि  को दिया परन्तु आयुर्वेद का ज्ञान तब तक पृथ्वी पर नही आया | इस प्रकार पृथ्वी पर समस्त मानव भयंकर रोगो से पीड़ित हो कर अकाल मृत्यु को प्राप्त होने लगे | ऋषियों  की तपस्या, उपवास, अध्यन, ब्रहमचर्य,व्रत, नियमादि मे रोग विध्नस्वरूप उपस्थित होने लगे अतः पुण्यकर्मा  महर्षियों  ने प्राणिमात्र पर दया कर हिमाचल के समीप शुभ  एवं पवित्र स्थान पर पृथ्वी पर भयंकर रोगों से बचने के लिए ऋषियों  की सभा का आयोजन किया जिसमे अनेक  महर्षि ब्रह्मज्ञानी आदियों  ने विचार विमर्श किया की पृथ्वी के चार पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति हेतु आरोग्य रहना ज़रूरी  है। रोग  इन चारो पुरूशार्था की प्राप्ति मे बाधक है। इस प्रकार आपस मे विचार विमर्श कर समस्त ऋषिगण ध्यानमग्न हो गये और अपने दिव्य चक्षु से रोगो के कारण को देखने लगे। तब उन्हे अपने दिव्य चक्षु से देखा कि आयुर्वेद का उपदेश राजा इन्द्र के पास है परन्तु उनके पास स्वर्ग मे कौन जाये तब महर्षि भारद्वाज ने सभा  मे उठकर कहा की मुझे राजा इन्द्र के पास भेजा जाये तब सब ऋषियों  ने भारद्वाज जी को भेजने मे सहमति जताई व भारद्वाज जी इन्द्र के पास पहुँचे व इन्द्र को पृथ्वी पर भयंकर रोगों से अवगत कराया तब इन्द्र ने भारद्वाज जी को आयुर्वेद का उपदेश   दिया तब उन्होने पृथ्वी पर आकर समस्त  महर्षि व ऋषियों  को आयुर्वेद से अवगत कराया।

 

ब्रह्मा
दक्ष प्रजापति
अश्विनी कुमार
देवराज इन्द्र
भारद्वाज
आत्रय

 

अनेको ऋषि मुनि एक-दूसरे को आयुर्वेद का उपदेश देते रहे तब पृथ्वी से रोग नष्ट होकर समस्त प्राणी अपनी पूर्ण आयु विकारो से रहित होकर भोगने लगे। आयुर्वेद के उपदेश सारांश में यहाँ प्रस्तुत करत हूँ आपलोग ध्यान से अगर समझ गये तो कष्टों से बचा जा सकता है|

आयुर्वेद के मता नुसार पृथ्वी पर रोग के दो कारण प्रबल हैं

1. सोच विचार

2. ख़ान-पान

वात, पित्त, कफ यह शरीर को बनाने वाले होते है यदि यह शरीर में सम होते है तो हम निरोग रहते है और अगर यह शरीर मे सम न हो तो रोग का प्रकट करते है।

न जन्तुः काष्चिदमरः प्रथिव्यामेब जायत ।
अतो मृत्युरकार्य स्याकिन्तु रोगो निबयित ।।

इस पृथ्वी पर कोई भी  प्राणी अमर नही है अतः मृत्यु अनिवार्य है किन्तु औषधि एवं युक्ति (जप, तप, मन्त्र, यन्त्र, दान आदि) से रोगो का निवारण किया जा सकता है। जो मनुष्य रोग के आरम्भ काल में उसकी चिकित्सा नही करता या रोग को दबाता है उस प्राणी का साध्य रोग कुछ काल बाद असाध्य हो जाता है। मृत्यु को औषधि जप, तप, होम, दानादि से शांत किया जा सकता है परन्तु काल मृत्यु (पुर्ण आयु को) किसी से भी शांत नही किया जा सकता। आयुर्वेद में लिखा है कि   निम्न  प्राणियों   की चिकित्सा नही करनी चाहिए क्योंकि निम्न  प्राणियों  को रोग मुक्त नही किया जा सकता (1. स्वेच्छाचारी 2. मृत्यु के समीप 3. इन्द्रिशक्ति से रहित 4. दुष्ट व्यक्ति 5. चिकित्सा से द्वेश करने वाला 6. श्रद्धाहीन 6. औषधि से द्वेश करने वाला 8. स्वाद के अधीन रहने वाला आदि) रोग उत्पन्न होते ही उसकी चिकित्सा करनी चाहिए यदि रोग बार-बार हो रहा हो तो समझ लें कि हम रोग को दबा रहे है न कि उसको ठीक कर रहे है।

 आयुर्वेद दर्शन

            आयुर्वेद हमारा  एक ऐसा ग्रन्थ है ज़ो हमे यह ज्ञान कराता है क़ि किस प्रकार अहित आयु को हित आयु की ओर ले जाना है। आज समाज में अयुर्वेद को एक जड़ी-बूटी के रूप् में पेश   किया जा रहा है, अगर आयुर्वेद जड़ी - बूटियाँ हैं तो हम बचपन से ही गेहूँ, चावल,दाल, आलू, साग,सब्जी जो खा रहे है यह भी जडि़यों  से ही प्राप्त होते है फिर सारा संसार अनेक प्रकार की दुर्लभ बिमारियों से क्यों ग्रस्त है जिनका ईलाज किसी भी चिकित्सा   से नही हो या रहा हर परिवार में लोग अनेक प्रकार की बिमारी से परेशान है छोटे बच्चो से लेकर बड़े बुजूर्ग आदि सब किसी न किसी बिमारी  से परेशान  है | देश मे चिकित्सा की कोई कमी नही है परन्तु सब लोग बिमारियों से परेशान होकर उनसे मुक्ति पाने के लिए इधर-उघर भटक रहे है सारी चिकित्साए रोग ठीक करने की बात करती है पर कुछ दिन उनको ठीक कर दूसरे रूप् मे उजागर कर देते हैं

आयुर्वेद में तीन प्रकार की चिकित्सा के बारे में लिखा है:

                        1.दैवीय चिकित्सा (जप, तप, मन्त्र, होम आदि)
                        2.मानुषी चिकित्सा (वनस्पति औषधि द्वारा)
                        3.आसुरी चिकित्सा (शस्त्र, चीड़ फाड़, केमीकल का उपयोग)

इन निम्न चिकित्सा में दैवीय चिकित्सा को आयुर्वेद के अनुसार नंबर 1 माना जाता है फिर मानुषी चिकित्सा जो वनस्पति से की जाती है 3 नंबर पर आसुरी चिकित्सा आती है।
 
            मानुषी चिकित्सा के द्वारा शरीर  की धातुएँ (वात, पित्त, कफ यह शरीर की धातु भी है और दोष भी है।) सम कर दी जाती है तो शरीर निरोग हो जाता है व अगर शरीर  की धातुएँ (वात, पित्त, कफ) घट या बढ जाती  तो शरीर मे रोग उत्पन्न करने लगती है। प्रत्येक प्राणी की शरीर की रचना धातुओं द्वारा होती है व हर प्राणी की एक प्रकृति ( वात, पित्त, कफ) होती है यह प्रकृति जन्म से बन जाती है। जिस प्राणी की प्रकृति शरीर को रोगी बनाती है उस प्रकृति को सम करना ही चिकित्सा का कर्तव्य होता है परन्तु आज चिकित्सक प्राणी की प्रकृति पर कार्य न कर के रोगो पर कार्य कर रहे है जिस की वजह से चिकित्सको को सफलता  नही मिल रही है इस संसार में रोगों के दो कारण माने गये है एक तो खान-पान दूसरा मानसिक विकार दो वस्तुएँ प्राणी की प्रकृति को खराब कर के रोगो को उत्पन्न करती है आयुर्वेद मे लिखा है कि अगर प्राणी का खाना उसकी प्रकृति के विरूद्ध है वो उस को ठीक करा जाये और अगर मानसिकता खराब है तो उसे सत्संग के माध्यम से ठीक कर के औषधि दी जाये तो निरोग हो सकता है। आयुर्वेद मे इनको आदि (सोचविचार) व्याधि (खान-पान) का उल्लेख किया गया है। देखने मे आता है कि प्राणी जब आयुर्वेदिक चिकित्सा मे आता हे तो सोचता है कि इस चिकित्सा के दौरान उसे खान-पान मे परहेज करना पड़ेगा प्राणी की यह सोच गलत है हर प्राणी जो भी खाना खता है वह शरीर को पुष्ट न कर के रोगी बना देता है तो आप ही बतायें की आयुर्वेदिक चिकित्सा के दौरान कहाँ परहेज है हाँ अगर आयुर्वेद आप को अपनी प्रकृति का खाना बता रहा है तो परहेज कहाँ पर आता है क्योंकि इस पृथ्वी का सारा खान पान हर प्राणी के लिए नही है सब की प्रकृति के अनुसार ही इस प्रकृति ने अन्न दिया है तो यह कहना होगा की हर प्राणी हर अन्न व फल आदि को नही खा सकता। सिर्फ अपनी प्रकृति की पहचान कर के ही अन्न व फल का सेवन करें क्योंकि यह सिर्फ आयुर्वेद की पुस्तकों मे हमारे ऋषियों ने लिख है अगर पशुओं को देखे तो हर पशु अपनी प्रकृति के अनुसार ही भोजन करता है इसलिए पशुओं को चिकित्सक की जरूरत नही पड़ती वह अपनी प्रकृति के अनुकूल अन्न या फल ही खयेगा अन्यथा जितनी कोशिश कर ले और अगर कारण वश उस पशु को अपनी प्रकृति के विरूद्ध भोजन लेना पड़ा तो वह बीमार हो जाता है या मर भी जाता है। (शहरों मे या घरों मे जितने भी पशु है यह सब बीमार रहते है परन्तु जंगलों मे रहने वाले पशु स्वस्थ रहते है कारण शहरों व घर पर रहने वाले पशुओं को अपनी प्रकृति के विरूद्ध खाना पड़ता है जो उन के रोगों का कारण बन जाता है।)

            इस पृथ्वी की रचना वात, पित्त, कफ त्रिविधि से की गई है वात वाला प्र देश जहाँ न ठण्ड हो ना पानी ज्यादा है। पित्त वाला प्र देश पहाड़ी प्र देश या जहा वर्फ आदि हो, कफ वाला प्र देश जहा पानी ज्यादा हो जैसे समुद्र हो। इस लिए जो प्राणी जहा रहता हो उसी प्र देश का अन्न, फल, सब्जी (मौसम वाली) को ही ग्रहण करना चाहिए क्योंकि हमारी पाचनक्रिया उस प्रकृति के अनुसार ही कार्य करती है। हर प्राणी के शरीर के दो कार्य होते हैं दीपन (भुख लगना), पाचन (खाना पचना) अगर प्राणी को भुख् लगे व खाना पच जाये तो शरीर निरोग रहता है परन्तु भुख लगे व खाना न पचे तो शरीर मे भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते है तो आप लोग अगर  बार-बार खा रहे है तो पाचन क्रिया अवश्य खराब हे जाती है आयुर्वेद के मता अनुसार भोजन दो बार करना चाहिए पहला प्रातः 10 बजे से 12 बजे इस भोजन मे आप दाल, सब्जियाँ, चावल आदि खा सकते है व रात को 7 बजे से 9 बजे हल्का भोजन करें | फल, मिठाई आदि भोजन से आधे घन्टे पहले लेने चाहिऐ भोजन के बाद कभी भी ये चीजें न ले नही तो भोजन पचता नहीं है। स्वाद के चक्कर में हर प्राणी रोगो से ग्रसित होता जा रहा है सुबह, दोपहर, शाम,रात, खाने के चक्कर मे शरीर को पुष्ट न करके रोगो को निमंत्रण देता जा रहा है आयुर्वेद के मतानुसार प्राणी को प्रकृति के व उम्र के हिसाब से भोजन करना चाहिए 1 से 10 साल तक के बच्चो को भारी भोजन (मीट, फास्ट फुड, जंक फुड, अण्डा चावल चाकलेट) नहीं देना चाहिए क्योंकि उनका शरीर विकास की ओर चल रहा होता है परन्तु आज शरीर  के विकास के लिए लोग भारी खाना दे रहे है जिसकी वजह से बच्चा बिमार ही रहता है। पाठको से विनती हे कि आप लोग इस पर विचार कर प्रकृति  के अनुसार अपना खान पान रहन-सहन, आदि जरूर अपनाये नही तो भयंकर रोगों से हम लोगों को कोई नही बचा सकता।


                                              " हिताशी स्यनंमतशिस्यात्काल भोजी जितेन्द्रिय "

अर्थात :  मनुष्य को हितकारी पदार्थो का सेवन करना चाहिए वह भी हल्की मात्रा में समय पर खाना चाहिये और जितेन्द्रिय बनना चाहिए।

         मनुष्य  को  बार बार नही खाना चाहिए व दिन में पूरा भोजन  व रात को हल्का भोजन करना चाहिए रात को कभी भी प्रोटीन चावल, दही, सलाद, मीट, मच्छी नही खाना चाहिए। रात को जब हम सो जाते है तो पाचन क्रिया अपना कार्य कम करती है व गुर्दे अपना कार्य करते है। रात को ज्यादा काम, जगना आदि नही करना चाहिए क्योंकि हमारी प्रकृति में ऑक्सीजन की कमी रहती है। (सूर्यास्त के बाद पेड़ पौधे कार्वन डाई आक्साईड छोड़ने लगते है) इसलिए प्रातः काल जल्दी उठना चाहिए क्योंकि प्रकृति मे ऑक्सीजन की भरपूर मात्रा रहती है वनस्पति सुबह 4 बजे से ऑक्सीजन देना शुरू  कर देती है|  सूर्य उदय से एक घंटे पहले उठ जाना चाहिए क्योंकि सुर्य उदय के वक्त व अस्त होते वक्त वायू को विकृत करते हे आयुर्वेद के अनुसार सूर्य, चन्द्र, पवन रोगो को बनाते है जैसे पवन (वात),  सूर्य (पित्त), चन्द्र (कफ) के कारक है जब यह तीनो शरीर के सही कारक नही होते तो रागो को उत्पन्न करते है| इनका हमें सही प्रमाण से उपयोग करना चाहिए इन तीनो को अपने अनुकुल करने के लिए नियम, व्रत,मन्त्र जाप का पालन करना चाहिए। प्रकृति  (पृथ्वी) के ये तीनो कारक है इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने ऋतुओं पर नियम, व्रत, होम आदि कर के जीवन को स्वस्थ बनाने की विधियां बनाई जो कि धीरे -धीरे लोग भुलते जा रहे है अगर ऋतुओ का पालन करते भी है तो गलत तरीके से एक, एक उदाहरण यहाँ पर आपलोग को दे रहा हूँ चैत्र व आष्वीन मास मे जब हम नवरात्रों के व्रत रखते है ता सब लोग उनदिनों मे ज्यादा मात्रा मे फलहार लेते देखे गये है जबकि नियम है कि चैत्र व अश्विन मास के पूरे एक महीने आयुर्वेद मे  1 समय भोजन का नियम है क्योंकि इन महीनों के बाद ऋतु परिवर्तन का समय होता है (चैत्र के बाद गर्मी व आश्विन के बाद ठन्ड ऋतु का समय होता है) आयुर्वेद के मतानुसार हम लोगो को कम भोजन कर के शरीर को गर्मी व ठन्ड के अनुकुल बनाने के लिए यह व्रत रखने होते हैं ताकि शरीर  मे ऋतु से लड़ने की क्षमता बड़े परन्तु लोग उन दिनो मे ज्यादा खा कर आने वाले समय पर शक्ति हीन होकर बिमारियो (मलेरिया, डेंगु, चिकन गुनीया ज्वर आदि) से ग्रस्त हो जाते है आयुर्वेद के मतानुसार शरीर मे रोग एक दम नही बनते है। धीरे-धीरे जब पाचन कमजोर होता जाता हे तो खाया हूआ रस दूषित होकर हमारे शरीर  मे रहता है तब तक हम स्वस्थ जीवन व्यतीत नही कर पाते। इसलिए हमे ऋतुओं का हमेशा  ध्यान रखना चाहिए |


यहाँ पर ऋतुओं के बारे मे आप ध्यान से जान ले कि किन ऋतुओं मे हमारे वात, पित्त, कफ ठीक रहते हे व कब खराब हो जाते है उन ऋतुओं में अगर ध्यान रखा जाये तो हम बिमारियों से बच सकते है।

रोगों के दोष व दमन की ऋतुएँ:

  वात पित्त कफ
संचय (रोग शुरू होना) ग्रीष्म ऋतु वर्षा ऋतु हेमन्त ऋतु
कोप (रोग होना)    वर्षा ऋतु शरद ऋतु बसन्त ऋतु
शमन (रोग ठीक होना) शरद ऋतु हेमन्त ऋतु    ग्रीष्म ऋतु

 

यहाँ पर ऋीतुए वात, पित्त, कफ को कब बढाती है या घटाती है आप ध्यान से पढकर उन ऋतुओं मे बात पित्त को सम रख कर शरीर को पुष्ट रख सकते हैं । दो महीने ऋतु रोग शुरू करती है, दो महीने रोग को उत्पन्न कर देती है, 2 महीने रोग को ठीक कर देती है । (संचय, कोप, शमन) इस प्रकार ऋतुओं को ध्यान मे रखकर ऋतुओ के फल, ऋतुओं की सब्जियां ही खाये | जो जहाँ रहता है उसी देश या प्रदेश की ऋतुओं की फल सब्जियां ले बाकी न ले तो रोगो से बचा जा सकता है आज देश में परिवहन सेवा होने से 12 महीने के फल व सब्जीयां हो गई है पर ना समझी के कारण लोग विरूद्ध ऋतु के फल व सब्जी खा कर बिमार पड़ रहे 

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