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भोजन का सही उपयोग

                   गर्मी के महीने मे हल्का भोजन करना चाहिए व सर्दियों में  आप  राजमा, ड्राय फूड व भारी खाना खा सकते है। मार्च से सितम्बर मे सादे भोजन अक्टूबर से फरवरी भारी भोजन इस प्रकार आप लोग भोजन की व्यवस्था कर सकते हैं। जब तक स्वस्थ् न हो जाये तब तक हल्का ही खाना खायें चाहे सर्दियाँ  हो या या गर्मी हो । कभी भी खाली पेट ज्यादा पानी नही पीना चाहिए अगर आप खाली पेट है और प्यास ज्यादा लग  रही है तो थोड़ा कुछ मीठा खकर पानी पीना चाहिए। आज कल लोग सुबह उठकर 1 से 2 लीटर पानी खाली पेट पीते है जो गलत है आयुर्वेद मे प्रातः काल उठकर 150 से 200 मिली. (8 अंगुली पानी) पानी को पीने का विधान लिखा है  प्रात: काल सूर्योदय से एक घंटे पहले उठ जाना चाहिए उसके बाद पूजा आदि कर्म कर के अपने से बड़ो को प्रणाम कर के आशीर्वाद लेना चाहिए फिर अपनी प्रकृति के अनुसार औषधि खानी चाहिए हमारे ऋषियों ने जो खोज औषधि की है उस का हमे जरूर अपयोग करना चाहिए औषधि अपनी प्रकृति के अनुसार ही ग्रहण करनी चाहिए | जब भी आप अपनी प्रकृति के विरूद्ध खाना, फल, अनेक प्रकार के विटामिन लेंगे तो शरीर उनका पाचन न कर के अजीर्न (अपच,विषयुक्त) कर देता है जो कुछ समय पष्चात रोगो को शरीर मे प्रकट कर देता है अपनी प्रकृति की पहचान किसी अच्छे चिकित्सक से कराकर उस पर हमेशा  ध्यान रख कर भोजन, फल, औषधि ही ग्रहण करे तो आप अनेक प्रकार की बिमारियों से निश्चित अपना बचाव कर सकते है साथ मे ऋतुओं का ज्ञान रखकर भोजन को ग्रहण करे जब व्रत आदि  आप रखते  हैं , हल्के भोजन की या फल की व्यवस्था कर दिन में एक बार भोजन करे भारी भोजन न करें। बार-बार फल आदि न ले अगर आपका शरीर व्रत नही रख सकता तो जबरदस्ती  व्रत न करे उस से शरीर में कमजोरी आ जाती है आज कल लोग भगवान या ग्रहों  को प्रसन्न करने के लिए सप्ताह मे तीन या चार व्रत अदि रखते हे तो आप लोग यह समझ ले की अगर आप भगवान या ग्रहों को अपने अनुकुल करना चाहते हे तो सदाचार का पालन करे झूठ न बोले, दूसरों से इर्ष्या न करें, किसी का अहित न करें, सदा प्रसन्न रहे, समय एक जैसा कभी नही रहता दुःख व सुख हमारे भाग्य के अनुसार आते व जाते रहते है दैनिक जीवन मे देखा गया है कि दुःख कोई भी उठाना नही चाहता सुख की चाह मे भटकते रहने से सुख की प्राप्ति कभी नही हो सकता । आप चाहे कुछ भी कर ले सुख समय पर ही आता है। दुःख मे दुःखी न हो धीरज  रखे , दान, जप, पूजा, आदि अपनी शक्ति के अनुसार करते रहे | दुःख मे धीरज को नही खोना चाहिए व सुख मे ज्यादा प्रसन्न नही होना चाहिए सुख मे भी आप लोग पूजा, पाठ, दान, जप, तप, करते रहे क्योंकि यह जो कार्य हम करते है (जप, तप, पूजा आदि) यह सब मन का एकाग्र करने के साधन है। जब तक मन एकाग्र नही होता तो भगवान व ग्रहों को अनुकूल  नही किया जा सकता क्योकि दुःख व सुख का कारण केवल यह मन है मन ही काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि को उत्पन्न करने का कारण है जिस की वजह से हम अनेक प्रकार के दुःख, सुख आदि मे फँसकर अपना जीवन व्यर्थ गँवा वैठते है और पश्चाताप के सिवा कुछ नही बचता, ज्यादा कामना करने से मन चंचल हो जाता है जिस की वजह से लोग  अनेक प्रकार के मायाजाल मे फँस कर दुःखी हो जाता है व देखने मे आता है कि जीवन तक लोग का कामना  पूरी करने मे चला जाता है शरीर को पुष्ट जकर रखीये क्योकि पुष्ट शरीर ही दुःख व सुख दोनो का सही उपयोग कर सकता है अगर शरीर पुष्ट नही होगा तो दुःख व सुख दोनो ही दुःखदायी हो जाऐगे ऐसे हमारे संसार मे बहुत से उदाहरण है जि समे लोगों ने अपने शरीर को पुष्ट रखकर दुःख व सुख को सम भाव मे भोगा है जैसे मीराबाई, कबीर दास जी, रहीम  दास जी, तुलसी दास जी, भगवान रामचंद्र जी, राजा हरीशचंद्र, राजा भरत आदि |

        हरिदास जी, राजा हरीशचंद्र, राजा भरत आदि लोगों के शरीर पुष्ट होने के कारण मन चलायमान न होकर धीरज को रखता है वे विपत्ति मे भी सुख का अनुभव करते थे। इसलिए जिनका शरीर बलवान नही होता उनका मन चंचल होकर अनेक प्रकार के दुःखों को भोगता रहता है। हमारा शरीर एक ऐसा साधन है जिस के माध्यम से हम अनेक प्रकार के सुख, दुःख भोग कर भगवान की प्राप्ति भी कर सकते है यह साधन और किसी योनि मे नही है तो आप लोग भी इस शरीर का उपयोग करे अपनी प्रकृति के अनुसार खाना, पीना करे, कोई भी खाना पीना या कार्य अपने शरीर के अनुकुल करे, अधिकता हर चीज़ की खराब होती है (अति का भला न बोलना, अति का भला न चुप) अति हर चीज खराब होती है चाहे वह किसी भी रूप मे हो, आयुर्वेद मे हमारे खाने पीने आदि पर कोई प्रतिबन्ध नही है आयुर्वेद केवल आप लोगो को खाने की पहचान कराता है कि कौन सा खाना किस प्रकृति के माफिक आएगा सभी खाने या फल सभी व्यक्ति नही खा सकते। प्रकृति ने खाना व फल इस पृथ्वी के सभी प्राणियों के लिए बनाया है (मनुष्य,पशु,पक्षी आदि) आप लेग भी अपनी प्रकृति का ही खाना खाए।  जैसा आप लोगो ने देखा होगा की पशु-पक्षी सिर्फ अपनी ही प्रकृति का खाना खाते है इसलिए उनको चिकित्सा की जरूरत नही होती परन्तु हम हमेशा अपनी प्रकृति के विरूद्ध खाना खाते है और बीमार होते है चिकित्सक होने के बावजूद हम लोग स्वस्थ् जीवन व्यतीत करने मे असमर्थ होते है वायु देव, सूर्य देव, चन्द्र देव यह तीन देवता ही हमारे जीवन को दुःखी या सुखी बनाते है इन तीनो का अगर विरूद्ध उपयोग होगा तो हम बीमार होते है व यही तीनो देवता अगर सहायक हो तो हम निरोग होते है यह तीनो वात, पित्त और कफ का शरीर मे क्षय  कर रोग बनाते है व इनको सम रखकर निरोग रहते है।
 

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