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ध्यान देने योग्य बातें

ध्यान देने योग्य बातें
 
         आज  हमारा जल, वायु, खान , पान, सब दूषित हो चुका है जिस कि वजह से ऐसे रोगो की उत्पत्ति हो रही है जिस  का नाम सुना भी नही था। आने वाले समय के लिए डॅाक्टर लोग  बोल रहे है कि 20-30 वर्ष बाद जन्म से ही बच्चे रोगी उत्पन्न होने लगेंगे जब कि अभी देखा जा रहा है कि बच्चे रोगी ही उत्पन्न हो रहे है। आप लोग यह अच्छी तरह समझ ले कि बच्चे रोगी उत्पन्न नही हो रहे है बल्कि उत्पन्न होने वाले बच्चे के माँ-पिता ही अस्वस्थ  है जिस पिता का वीर्य व माता का रज (मासिक धर्म)  शुदध नही होगा, उन के बच्चे बिमार ही उत्पन्न  होंगे या बाद में बिमार हो जायेंगे आज इस बारे मे कोई  भी माता-पिता नही सोच रहे है। बस शादी  की, बच्चे हो गये जब बिमार बच्चे होते हे तो कर्म या भगवान को दोष्  देते है यह बात गलत है आप लोग समझ लें अगर खेत कितना भी उपजाऊ हो पर अगर बीज  काम का नही होगा तो फसल अच्छी नही हो सकती है। इसलिए आज हर माता-पिता को सोच कर  बच्चे करने चाहिए  माँ अपने रज की पुष्टि(शुद्ध) करे व पिता अपने वीर्य का सोधन करके ही बच्चा पैदा करे तो निरोग व स्वस्थ बच्चे का जन्म होगा। ब्रह्मा जी ने आयुर्वेद का प्रचार गृहस्थ आश्रम के लिए ही प्रकाशित किया  है ताकि इसका उपयोग कर के गृहस्थ जीवन को स्वस्थ व सुखी बना कर जीवन व्यतीत किया जाये पहले के राजा, महाराजा आदि लोग अपने पास आयुर्वेदाचार्य रखते थे तथा उनकी बनाई औषधि (अपनी प्रकृति के अनुसार) का नित्य सेवन करते थे तथा अपना गृहस्थ आश्रम सुखी व्यतीत करते थे
 
         यहाँ पर चीज चाहे औषधि हो या खाना अपनी प्रकृति का ही खाया जा सकता है इसलिए अच्छे आचार्य से अपनी प्रकृति की पहचान करा कर नित्य औषधि खाये तो आपका जीवन  कष्ट  के बिना व्यतीत हो जायेगा कोई भी असाध्य बिमारी आपको आ ही नही सकती कुछ लोग औषधि के बारे मे अपना मत कहते है कि हम इस को आदत हो जाएगा पर ऐसा कुछ नही है आप जैसे रोज खाना खते है ताकि जीवन अच्छा रहे तो औषधि भी नित्य ले ताकि आपकी पाचन क्रिया ठीक रहेगी तब तक असाध्य, साध्य रोग शरीर  को नष्ट  नही कर सकते आयुर्वेद मे रसायन औषधियां  व बीजीकरण ओषधियों का उल्लेख किया गया है रसायन औषधि के सेवन से कैसे व्यक्ति  दीर्घायु , स्मरण शक्ति, उत्तम अवस्था, अरोग्य, उतकृष्टप्रभा, उत्तम वर्ण (स्वर का सुन्दर होना) शरीर के रस, रक्तादि धातुओं को सम अवस्था मे रखना आदि को रसायन कहते है। यह रासायन औषधि विशेषकर बाल्यावस्था से किशोरावस्था  तक फिर बाद मे बृद्धावस्था मे उपयोग करनी चाहिए।
 
वाजीकरण: अनेक प्रकार की चिन्ता से, बृद्धावस्था से अधिक शुक्र के क्षय से या शुक्र  की उत्पत्ति न होना, नपुंसक, इन्द्रियों का क्षीण होना, रस रक्त, मांस मेद अस्थि मज्जा आदि को पुष्ट करने के लिए वाजीकरण औषधि का उपयोग 16 वर्ष की आयु के बाद करना चाहिए, शादी   के बाद विशेषकर  जब स्त्री या पुरुष का शरीर  अनेक कारणों से क्षीण हो जाते है तो बाजीकरण औषधि का उपयोग करना चाहिए वह भी अपनी प्रकृति के अनुसार ताकि पुरुष का वीर्य व स्त्री का रज शोधन किया जा सके। यह औषधि 60 से 65 वर्ष  तक यानि 16 साल से 60-65 वर्ष  की आयु तक ही खानी चाहिए वह भी जब पुरुष  या स्त्री गृहस्थ आश्रम की कल्पना करे अगर गृहस्थ आश्रम न बसाना चाहे तो रसायन औषधि का प्रयग करें। इस प्रकार आप देखेगे की  ब्रह्मा जी ने किस प्रकार आयुर्वेद का निर्माण  कर पृथ्वी  के लोगों के हित के लिए वेद का निर्माण किया परन्तु हम लोग उस से वंचित रह कर नाना प्रकार के दुःख, कष्ट, रोग आदि जीवन का आनन्द नही ले सकते। काम, क्रोध, लोभ, मोह यह उसी को सताते है जिनका शरीर कमजोर होता है यह बात हम आज तक नही समझ पाये कि हमलोग अच्छा खान-पान, रहन-सहन होने के वावजूद काम, क्रोध, लोभ आदि मे पूरी तरह से क्यो फँसते जा रहे है इसका कारण आयुर्वेद आपकी धातु (रसुमास) आदि की कमजोरी मानता है  हमने इसका (औषधि का) प्रयोग  अनेक बच्चो के शरीर व बृद्ध लोगो पर किया आप लोग हैरान होंगे कि उन सभी लोगो मे आश्चर्यजनक  बदलाव देखने को मिला कुछ लोगो का क्रेाध बिलकुल शांत  हो गया, चंचल बच्चे सुधर  गये, उल्टा, सीधा खाना बन्द हो गया | जो  लोग जीवन की इच्छा नही रखने थे उन लोगो ने मरने का विचार बदल दिया, अनेको प्रमाण है यह हम आप लोगो का सच से अवगत करा रहे है क्येंकि आयुर्वेद का निर्माण जगत के रचयिता नेजगत को स्वस्थ रखने के लिए किया यह कदापि झूठ नही हो सकता तो आप लोग आयुर्वेद को समझ कर उसका आचरण करे व जीवन आनन्द प्राप्त करे चाहे गृहस्थी हो या त्यागी सब इस का उपयोग कर रोग व्  तनाव आदि से मुक्त हो सकते हैं।
 
वात रोग के कारण:- तीखा, कटु, काशाय रस वाले  दव्यो के सेवन से, भारी भोजन करने से, मुत्र आदि के वेगो को रोकने से, भय से, शोक से, चिन्ता से, अधिक  व्यायाम करने से, मैथुन करने से, ग्रीष्म  ऋतुओं मे, दिन के अन्तिम भाग मे, रात्री के अन्तिम भाग मे, अहार के पाचन के अन्त मे, आदि से वात कुपित हो जाता है।
 
पित्त रोग के कारण:- कटु, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण,लवण, क्रोध, विरुध भोजन से, शरद ऋतु में, दिन में, मध्य रात्री मे, भोजन के परिपाक के मध्य में पित्त कुपित होता है।
 
कफ रोग के कारण:- मीठा, अम्ल, लवण तला पदार्थ, भारी चीज़े, दही, ठन्डी चीजे, ज्यादा बैठे रहने से, दिन मे सोने से, सुखी जीवन भोगने से, अजीर्ण से, ज्यादा पुष्टिकारक  पदार्थ से, भोजन के परिपाक के शुरू मे, वमन आदि करने से, बसन्त ऋतु मे दिन के प्रथम भाग मे, रात्री के प्रथम भाग मे कफ कुपित होता है।
 
त्रिदोश रोग के कारण:- (वात, पित्त, कफ को त्रिदोष कहते है)  दोषों  को कुपित करने वाले आहार को मिलाकर खाना अनेका आहारो को मिलाकर खाना, अजीर्ण अपनी प्रकृति के विरूद्ध खाना, ज्यादा कच्ची मूली खाना, खराब खाद्या पदार्थ, से खराब फल व सब्जी से सूखे या कृष्ण मास के खाने से, अहार मे सहसा परिवर्तन करने से पूर्व दिशाकी हवा से, ग्रह की क्रूर दृष्टिसे ,ऋतुओं के कोश से, पाप कर्म से व पूर्व जन्मों के कर्मो से  तीनो दोष खराब हो जाते है। प्रसव के समय नारी की उचित चिकित्सा न होने पर भी तीनो दोष  खराब हो जाते है। इस प्रकार तीनो दोष वात, पित्त, कफ शरीर का निर्माण करने वाले व शरीर  को नष्ट करने वाले भी होते है इन को सम रखने पर शरीर निरोग रहता है इन को सम करने के लिए अपनी प्रकृति के अनुरूप खाना, व्यायाम करना आदि करे नही तो यह वात, पित्त, शरीर  में सम न रह कर ज्यादा या कम हो जाते है जो अनेक प्रकार से शरीर को नष्ट  करते है। शरीर को पुष्ट रखने के लिए सदाचार ही कामयाब है | जीभ के स्वाद को रखने से शरीर  को बिमारीयों से कोई भी नही बचा सकता इसलिए जीभ के स्वाद से बचने की कोशिश  करनी चाहिये | मृत्यु का कारण जीभ ही बनती है चाहे वो बोलने मे हो या खाने मे इसलिए जीभ को हमेशा  चैक करते रहे नही तो यह आफत खड़ी कर सकती हे। स्वस्थ शरीर  ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को प्राप्ति करा सकता है। रोगी शरीर  कुछ भी नही कर सकता। आज से अपने को स्वस्थ रखने के लिए बीड़ा उठाये व आयु को स्वस्थ भोगे यही कामना करते हुए आप लोगो को यह पढने को दे रहा हू इसे हप्ते मे एक बार ज़रूर पढे ताकि मन की भ्रान्तियां खत्म हो जाये  और एक स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सके।
 
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He said no worries at all and follow the rules & diets of ayurveda and gave medicine just for a month.but i noticed the differnce just in fifteen days and now i am absolutly fine & happy with my family.

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Ravi Ayurveda

 

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